October 28

अपने सोच को बदलो !

अगर जीवन में कुछ करना हैं हासिल तो
अपनी सोच को बदलो !

मरे हुए उन ख़्वाबों को
पहले जिन्दा करलो !

नहीं होगा हमसे ये संभव
इस वहम को मन से निकालो !

आज सफल जो कोई भी हैं
वो भी एक हाड़मांस का पुतला हैं !

फर्क उसमे और तुममें सिर्फ इतना हैं
उसने अपनी सोच बदल ली !

उसके जैसा बनना हैं तो
तुम भी अपने सोच को बदलो !

नहीं होगा ये संभव के बदले सोचो
होगा ये सब मुझ से संभव !

फिर अपने ख़्वाबों को सहलाओ
उसे बड़ा बनाओ !

जितनी बड़ी ख्वाब तुम्हारी होंगी
उतना बड़ा नतीजा होगा !

इन ख़्वाबों के बल पर ही
हर ख्वाब तुम्हारा पूरा होगा !

कुछ लोगों ने खुद को बांध रखा हैं
संकीर्ण विचारों के जंजीरो में !

वो तो ऐसे जकड़े हैं अपने ही जंजीरो से
नहीं करना चाहते आजाद खुद को अपने जंजीरो से !

उन्हें बताया सिर्फ सोच बदल कर
आप अमीर बन जाओगे !

ऐसे डर के भागे वो कही अमीर ना बन जाये
झेल गरीबी वो  दस्तूर बना अब अमीरी से डरते हैं!

कैसे बदले सोच ऐसे लोगों का उन्हें अमीर बनाये
नहीं मुश्किल ये भी कोई अगर हम कुएँ का रस्सी बनजाये !

हमारी कोशिश की  कोमल रस्सी सख्त  पत्थर पे दाग
बनायेगी, उन्हें समझ में आयेगी !

तब वो सोच को अपना बदलेंगे
और जीवन उनका भी बदल जायेगा !

अगर जीवन में कुछ करना हैं हासिल तो
अपनी सोच को बदलो !!!

— Written by Anil Sinha

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October 28

ॐ शांति ॐ !

मैं एक पवित्र आत्मा हूँ !
बाबा के निर्देश से
युग परिवर्तन के पुण्य कार्य में लगा हुआ हूँ !

डॉ शिवानी के राजयोग तथा विचार क्रांति ने
मेरे जीवन का रुख ही बदला हैं !
खुद को,
बदल कर लोगों को बदलने के कार्य में लगा हुआ हूँ !

उनके मार्ग दर्शन में
इस कलयुगी दुनियाँ को
सतयुगी दुनियाँ बनाने के कार्य में लगा हुआ हूँ !

मैं एक कल्याणकारी कवि हूँ !
अपने कविताओं के माध्यम से
ह्रदय परिवर्तन कर जन जन का
मांसाहारी से शाकाहारी बनाकर 
पशु पकछियों को बचाने के कार्य में लगा हुआ हूँ !

मानव रूप में कुछ दानव भी हैं जग में
नारी का शोषण जो करते हैं
नारी के सम्मान हेतु
उनके  ह्रदय  परिवर्तन के कार्य में लगा हुआ हूँ !

हमारे साधु संत जो जग को जीने का सार बताते हैं
वो ही कही पीट पीट कर डंडो से
तो कही जिन्दा जलाकर मार दिये जाते हैं
ऐसे साधु संतो के जीवन रक्षा के कार्य में लगा हुआ हूँ !

गरीबी तथा बेरोजगारी से परेशान युवाओ को
पैसो का लालच देकर देश के दुश्मन आतंकी बना रहें हैं
रोजगार दिलाकर उन्हें बचाने के कार्य में लगा हुआ हूँ !

सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष आपस में ऐसे तनबैठे हैं
कि तृतीय विश्व युद्ध कि संकट मंडराई हैं
अगर हुई लड़ाई तो नहीं बचेगा कोई
फिर कैसे सतयुग आयेगा
राष्ट्राध्यक्षों को कविता के माध्यम से समझाने के कार्य में लगा हुआ हूँ !

सतयुग के आने से पहले
इस कलयुगी दुनियाँ का अस्तित्वा जरुरी हैं !
कलियुग को सतयुग में बदलने के कार्य में लगा हुआ हूँ !

मैं एक पवित्र आत्मा हूँ !
बाबा के निर्देश से
युग परिवर्तन के पुण्य कार्य में लगा हुआ हूँ !

— Written by Anil Sinha

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October 24

कुल दीपक !

इतिहाँस में हमने पढ़ा था कई कुल दीपक के बारे में
छत्रपति शिवजी  वीर कुवंर राणाप्रताप  जैसे कई कुल दीपक के बारेमे
सबने ढेरो काम किये अपने कुल का नाम किये !

वर्तमान में हमने पढ़ा हैं एक ऐसे कुल दीपक के बारे में
पालन पोषण सब राजघराने जैसा
सबने हाथो हाथ लिये कुछ ज्यादा ही सम्मान दिये !

पर उसने ना सीखा करना सम्मान किसी का
चाहे कोई हम उम्र हो चाहे हो रिस्तेदार
भले ही हो कोई प्रधान मंत्री
उनके आदेशों को  भी उसने दिये थे फाड़ !

जो भी हैं जैसा भी हैं हैं तो अपना कुल दीपक
यही सोच कर माँ ने उसको अपना पार्टी प्रमुख बनाया
पर वो घमंडी चूर नशे में अपना ऐसा रौब दिखाया
छोड़ दिए उसके कई पार्टी प्रभारी कई बड़े अधिकारी !

जब  चुनाव का मौसम आया वो चलागया विदेश
जूझ रही थी उसकी पार्टी अपना अस्तित्वा बचाने को
पार्टी प्रमुख विदेश भ्रमण पर माँ पड़ी थी बिस्तर पर
ऐसे में लाचार माँ ने अपने बेटी को अस्थाई भार थमाया

हुई करारी हार जो पार्टी कि
लौट आया विदेश के दौरे से
माँ बहन पर अपना गुस्सा दिखलाया
पार्टी प्रमुख के पद से इस्तीफा देकर अपना रोष जताया !

माँ परेशान हैं कैसे भी बेटे का भविष्य बनाये
पर बेटा मस्त मालिन्द हैं चिंता नहीं हैं कोई
ज्यों ज्यों पार्टी टूट रही हैं
माँ भी अंदर से टूट रही हैं !

जिस कुल दीपक के लिये वो ये आशियाना बनारही हैं
अब कुल दीपक ही उस आशियाने में आग लगा रहा हैं
हाथ जला कर बूढी ममता आग बुझा रही हैं
बेटे के लिये वो आशियाना बचा रही हैं !!

— Written by Anil Sinha

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October 24

कोरोना !

कौन हो आप कहाँ से आई हो
क्यों कर ऐसा कहर बरपाई हो !

पहले भी तुम्हारी बहने
प्लेग और हैजा के नाम से आई थी !

वो भी कई गांव शहर में ऐसा कहर बरपाई थी
कि कई गांव कस्बे को खाली करवाई थी !

पर तुम तो अपने बहनो से कुछ ज्यादा ही आगे हो
वो तो गांव कस्बो तक ही सिमटी थी
तुमने तो पुरे विश्व  को ही वीरान बनाया हैं !

ट्रैफिक जाम में फसने वाली सड़के भी सूनी हैं
दफ़्तर स्कूल मंदिर मस्जिद सभी बंद पड़े हैं
लाशो के अम्बार लगे हैं
मानो ये दुनियाँ कब्रिस्तान बनी हैं !

कल कारखाने मॉल दुकाने सभी बंद पड़े हैं
रोज कमाने खाने वोलो के बुद्धि मंद पड़े  हैं
क्या मांगे किससे मांगे चौकी चूल्हा सबके बंद पड़े हैं !

गाड़ी घोड़ा रेल तथा हवाई सेवा सभी बंद पड़े  हैं
इनसे जुड़े सारे रोजगार के साधन भी बंद पड़े हैं
बस खुली हैं अगन पेट कि पर रोटी के लाले  हैं !

घर से निकलना ही दूभर हैं लॉक डाउन हैं पूरा
कैसे भी घर से निकला था खाने को दो रोटी
रोटी तो मिली नहीं डंडे खाकर लौटा था !

खाकर डंडे जो उसे हुआ बुखार
धर पकड़ ले गये कोरोना वारियर्स
कोरोना हॉस्पिटल में भर्ती करवाया था !

कोरोना का ऐसा दहशत फैला था
कि वो और उसके जैसे कई शवों को
लेने कोई परिजन नहीं आया था
उन लावारिस शवों को बुलडोजर ने दफनाया था !

हे कॅरोना एक बात अब  सच सच मुझे बताओ
क्या तुम कोई विषकन्या हो
क्यों दहसत हैं तेरा लोगों में जबकि तू इतनी सुन्दर हो
तभी तो जवान ही नहीं कई बूढ़े भी तुझपे कुर्बान हुए हैं !

तेरा आवाहन करने को मोदीजी के कहने पर
मैंने भी कई बार ताली थाली बजाई और दीप जलाई
पर तू वाइट हाउस में बिजी थी तभी नजर ना आई !

नहीं करना हैं अब तेरा दर्शन मेरे पास ना आना
नहीं तैयार हुआ हैं वैक्सीनेशन पर ये कविता मेरा
तैयार हो चूका हैं
इसे सुना डालूंगा !

मैंने अपनी कविता सुनाकर
बड़े बड़े हॉल खाली करवाया हैं
तू भी दुम दबाकर  भारत से भागेगी
भारत रत्न मिलेगा मुझको
कविता के बल से मैंने कोरोना को भगाया !!!

— Written by Anil Sinha

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October 17

क्या हैं मेरे दिल की बातें ?

मैं एक इंजिनियर ऊँचे पदपर कार्यरत था
पर मेरे अंदर एक लेखक भी जिन्दा था !

लगता था कलकारख़ाने के कलपुर्जे से लेकर
पेड पौधे तथा जानवर जो भी आसपास था मेरे
अपने अपने तरीके से कुछ कहना चाह रहा था !

बहुत ब्यस्त रहता था अपने कामों में
फिर भी उनके बातोंको सुन किसी कागज के टुकड़े पर
या डायरी के पन्ने पे लिख लेता था !

फिर एक दिन ऐसा आया जब मैं
कैंसर से पीड़ित होकर मृत्यु शैया पे झूल रहा था
मुझे लगा वो पेड़ पौधे और जानवरो की ब्यथा
जो उन्होंने मुझे सुनाई थी मेरे साथ  ही चली जायेगी !

कितना भरोसा था उनको उनकी ब्यथा को
मैं दुनियाँ को बतलाऊगा !

बेटी जब आई हॉस्पिटल उसे अपने दिलका बात बताया था !

झटपट उसे डायरी के पन्नों से या कागज़ के टुकड़ो से जो भी मिलपाया !
उसको लेकर Emotions नाम से एक पुस्तक छपवाई !

उसी समय ओपरेशन से पहले मैं ईश्वर से बोला
हे प्रभु अभी मेरा काम अधूरा हैं !
सारे मूक जीवो की ब्यथा उनसे सुननी और सुनानी हैं !

घर परिवार तथा विश्व का वैमनष्य मुझे मिटानी हैं
अच्छे कविताओं के बलपर अपने देश को बहुत
सालो के बाद पुनः नोबेल पुरस्कार दिलानी हैं !

अतः हे प्रभु आप जीवन दान मुझे दे दो !
होगा आश्चर्य आपको मुझे ऐसे जटिल अवस्था में भी
जीवन दान मिला हैं !

अब मैं अपने काम से सेवानिवृत होकर
समाज और दुनियां की सेवा में समर्पित हूँ !

मेरे पाठक से बस एक निवेदन हैं
मेरे कविताओं को जन जन तक पहुंचाए
और इस पुण्य कार्य में मेरा हाथ बटाये !!!

— Written by Anil Sinha

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October 17

साधु संत !

इतने सुन्दर जीवन का
सुख का वैभव का मोह त्याग कर
साधु संत कोई बनता हैं !

क्या हम ने कभी सोचा हैं
क्यों कोई ऐसा करता हैं
सारे सुख को छोड़ साधु संत वो बनता हैं !

विज्ञान का रहश्य जिसतरह
वैज्ञानिक ढूढ़ता हैं !

जीवन का रहश्य
साधु संत ढूंढता हैं !

जिसतरह वैज्ञानिक  विज्ञान के शोध में
अपना दिन रात खपाता हैं !

जीवन का रहश्य ढूढने में
साधु संत अपना जीवन खपाता हैं !

ये बात अलग हैं कि जहाँ
वैज्ञानिक अपने शोध से
सोहरत पैसा पाता हैं !

वही साधु संतो का शोध
नहीं पहचाना जाता हैं !

सुख साधन पैसा पहचान की मनसा
पहले ही वो छोड़ चूका होता हैं
इसलिए उनको कोई फर्क नहीं पड़ता हैं !

विदेशो में फिर भी उन्हें
पहचान तो मिलती हैं
पोप पादरी फादर के नमो से जाने जाते हैं !

सुख सुविधा के साधन भी उनको मिलते हैं
क्यों कि उन्होंने उसका नहीं परित्याग किया होता हैं !

उन्हें गलती से भी अगर कोई हाथ लगाता हैं
पलक झपकते वो सक्स सलाखों के पीछे होता हैं  !

पर हमारे देश में ऐसे साधु संतो का हाल बुरा होता हैं !
ऐसे लोग जो समाज के लिये  जीवन सार बताते हैं !
असामाजिक तत्वों द्वारा कभी पीट कर कभी जलाकर
वे मारे जाते हैं !

सरकारे भी पतानहीं क्यों संवेदनहीन बनी रहती हैं !
इनके सामाजिक कार्यों के लिये कोई मुआवजा या भत्ता नहीं होती हैं !
ना ही इनको कोई प्रशंसा  या ताम्रपत्र दी जाति हैं !

फिर भी इनके जीवन के रक्षा का दायित्व
हम सबकी तथा सरकारों की हैं !!!

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October 17

नारी का सम्मान करो !

कौन हैं नारी पहले समझो
फिर उसका सम्मान करो !

नारी जननी हैं नारी माता हैं
झुक कर उसे प्रणाम करो !

नारी रूप हैं बहना का
बहना के प्यार उसके राखी का सम्मान करो !

विधि विधान से वरण किया जिस नारी को
छोड़ आयी जो अपने आंगन को सिर्फ उस  नारी को
पत्नी रूप में स्वीकार करो !

पति पत्नी के प्यार स्वरुप
एक नन्ही कलि घर आपके आई
उस नारी को बेटी रूप में स्वीकार करो !

चाहे जिस रूप में हो नारी
हर रूप में ममता स्नेह प्यार के रंगों से
भरा हैं आपके जीवन को
उस नारी का सम्मान करो !

नारी फूल हैं दुनिया के बगिया का उसकी ममता स्नेह व प्यार उसकी सुंदरता हैं 
उसके सुंदरता का सम्मान करो !

नारी का सम्मान उस माली का सम्मान हैं
जिसने इस दुनियाँ के बगिया को
सुन्दर फूलो से सजाया हैं
उस रचना कर्ता  के रचना का सम्मान करो !

ईश्वर के उस बगिया के हम सब चौकीदार हैं
जीवन में जिस पदपर भी हो
इस चौकीदारी का भी कार्य करो !

तब क्या ये संभव होगा
हम सब चौकीदारों के होते
कोई एक दरिंदा आये
फूल तोड़ हमारे बगिया का उसे मसल कर जाये
अपने प्राण गवां कर भी उसका तुम प्रतिकार करो !

माँ बेटी बहन व पत्नी ये फूल हमारे बगिया के हैं
इन फूलों को जाति धर्म समाज में ना बांटो
ये तो बस सुंदरता हैं बगिया का यही धर्म हैं इनका
इस सुंदरता का सम्मान करो नारी का सम्मान करो !!!

— Written by Anil Sinha

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October 17

मैं शेर का बच्चा !

आंख खुली धरती पर मेरी जब !
खुद को राजवंश में पाया !
देख पिता का रौब मैं मन ही मन हर्षाया !!

ये आशीर्वाद प्रभु का हैं !
जो जन्म हुआ हैं मेरा जंगल के राजा के घर में !
आभार प्रगट करने को प्रभु का मैंने शीश झुकाया !!

जब मैं कुछ बड़ा हुआ !
तो संग खेलने को एक साथी ना पाया !
दूर दराज जो बच्चे खेल रहें थे जो उन्हें पास बुलाया !
भाग गये वो सब डरके मुझसे कोई पास ना आया !!

क्यों डरते वो सब मुझसे मुझे समझ ना आया !
कोमल मन बच्चे का मेरा बिन साथी मुरझाया !
माँ ने पूछा जो हाल मेरा मैंने अपना दुखड़ा बतलाया !!

नहीं असंभव कुछ दुनियाँ में माँ ने मुझे बताया !
नित प्रयास करो कोई ना कोई साथी मिल ही  जायेगा माँ ने मुझे समझाया !!

फिर निकल पड़ा जो पुरे हौसले से एक छोटा मेमना पाया!
भाग रहा था वो भी डर से पर जाकर सामने
मैंने उसे समझाया !

मेरे जीते जी तुझको एक खरोंच ना आएगा
मैंने उसे  बताया !!

तबक़ही जाकर बमुश्किल उसने दोस्ती को हाथ बढ़ाया !
हुई घनेरी हमारी दोस्ती
मैं जय वो वीरू कहलाया !!

एक दिन शाम को जब मैं खेल कर आया
और पापा को अपना भूख जताया !

निकल पड़े शिकार को झटपट कहा तुरंत लौट कर आया
कुछ देर में उन्होंने मेरे वीरू को जबड़े में दबोच कर लाया !

खून में लतपथ मेरा  वीरू पीड़ा से कराह रहा था
पापा की आँखे चमक रही थी मानो तोहफा कुछ लाया !

छोड़ उसे मेरे सामने वो चले गये वहाँ  से
चाट  चाट के अपने वीरू के जख्मो को मैं उसे सहलाया !
अपने अधखुले आँखों से वीरू मुझको देख रहा था
मानो वो कहरहा था हमने विश्वास घात किया उससे
अपना वादा नहीं निभाया !!


बंद हो गई जो उसकी ऑंखें खुदपर गुस्सा बहुत ही आया 
नहीं काबिल हूँ किसी के दोस्ती का
जो दोस्ती का धर्म नहीं मिभा पाया !

मैं खुद से बोला ये आशीर्वाद नहीं अभिशाप प्रभु का हैं
जो जन्म दिया दानव राजा के घर में
अब नहीं गर्व हैं मुझको राजवंश में होने का
धिक्कार मुझे इस जीवन का अपने वीरू को बचा ना पाया !
कूद गया पहाड़ के छोटी से ये जीवन राश ना आया !!!

— Written by Anil Sinha

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October 17

आश्रित !

कितना दुखदायी होता हैं
किसी के आश्रित जब कोई हो जाता हैं !

जिसके आश्रित हो बीवी बच्चे और पूरा परिवार
दुखदायी बहुत ही होता हैं जब  खुदआश्रित हो जाता हैं !

साख फैलाये घने बट बृक्ष कि छाया में आश्रित कोई आता हैं
और शकून वो पता हैं तो वृक्ष का सीना चौड़ा हो जाता हैं, एक अजीब सा सुख वो  पाता हैं !

पर वक़्त बदलता जाता हैं वृक्ष के तरुवर से कई नये वृक्ष उग जाते हैं
सींच सींच कर उन वृक्षों को वृक्ष बड़ा वो करता हैं,
इतना बड़ा वो करता हैं कि खुद बौना होजाता हैं
बूढा होजाता हैं आश्रित होजाता हैं कल तक जो उसपे आश्रित थे उनपे आश्रित होजाता हैं !

ये प्रकृति का नियम हैं एक दिन दाता ही जाचक बनजाता हैं !
पर उस जाचक के दीन भाव को कहाँ कोई समझ पाता हैं !

भाव प्रगट करें अपने मन का इससे पहले ही
हर कोई उसको ही कुछ समझा जाता हैं
अभिब्यक्ति कि आजादी भी अब नहीं रही सोच सोच
मुस्काता हैं दिल टुटा हो पर हाँ में शीश हिलाता हैं !

खुद को वो समझाता हैं अब तो यूँ ही आश्रित रहना हैं
चाहे कुछ भी हो जाये बंद अपने जुबां को रखना हैं
वर्ना नहीं पता कौन सी बात आश्रय दाता को चुभ जाये
और हम आश्रित कोपभाजित हो फिर अनाथ हो जाएँ
अब तो धन कि नहीं कोई चाहत हैं प्यार का आश्रय जरुरी हैं !

नाती पोता गोद में खेले कुछ फरमाइश नाना नानी
दादा दादी से कर ले बस उनके ही चाहत को पूरा
करने को थोड़े से धन कि चाहत हैं !

उसके लिये भी इस बेचारे को किसी पे आश्रित रहना हैं !
कितना दुखदायी होता हैं
किसी के आश्रित जब कोई हो जाता हैं !!

— Written by Anil Sinha

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October 10

मैं पौधा – सेवा जीवन से अंत तक !

हम पौधे
जीते हैं जीवन
मानवजाति के लिये !

बचपन से मरने तक और उससे भी आगे
हम समर्पित होते हैं
मानवजाति के लिये !

कसम जो हमने खाई हैं
होगा समर्पित हमारा जीवन
मानवजाति के लिये !

सांसे हमारी होती हैं
उनके साँसो के लिये
बड़े घनेरे होते हैं हम उनके छाओ के लिये !

तरह तरह के फल सब्जियों से
हम लद जाते हैं
मानवजाति के भोजन के लिये !

बाग बगीचे को
फूलो से भरते हैं
मानवजाति के सजावट सुंदरता और खुसबू के लिये !

झूम झूम कर
ठंडी हवाओं का झोंका हम फैलाते हैं
मानवजाति के लिये !

जीवन काल तक  तो सेवा करते हैं
मरकर काठ भी हम बन जाते हैं
मानवजाति के लिये !

हम ही नहीं
पूरी कायनात बनी हैं
मानवजाति के लिये !

पर ये बेचारा मूर्ख
नये शहर बसाने को कलकारख़ाने लगाने को
मानवजाति जीवन दायी वृक्षों को काट रही हैं !

नहीं समझ हैं इनको शायद
जब तक हम जिन्दा हैं ये जिन्दा हैं
हम तो बस जिन्दा हैं मानवजाति के लिये !

हम पौधे
जीते हैं जीवन
मानवजाति के लिये !!!

— Written by Anil Sinha

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